बीजेपी में आंतरिक महासंग्राम: दरोगा भर्ती परीक्षा में ‘पंडित’ शब्द पर विवाद, प्रदेश मंत्री ने CM योगी को लिखी कड़ी चिट्ठी।

उत्तर प्रदेश की सियासत में एक नया उबाल आ गया है। दरोगा भर्ती परीक्षा के एक सवाल ने न केवल अभ्यर्थियों को चौंकाया है, बल्कि सत्ताधारी दल बीजेपी के भीतर भी एक बड़ा ‘गृहयुद्ध’ छेड़ दिया है। ब्राह्मण अस्मिता और राजनीति के गलियारों में अब यह मुद्दा चर्चा का केंद्र बना हुआ है।
दरोगा भर्ती परीक्षा: सवाल पर बवाल और ‘पंडित’ शब्द का अपमान
उत्तर प्रदेश में दरोगा भर्ती की हालिया परीक्षा में एक बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ) पूछा गया, जिसमें ‘पंडित’ शब्द को ‘अवसरवादिता’ (Opportunism) के विकल्प के साथ जोड़ा गया था। जैसे ही यह खबर सोशल मीडिया और राजनीतिक हल्कों में फैली, ब्राह्मण समाज और बीजेपी के भीतर का एक धड़ा आक्रोशित हो उठा।
बीजेपी प्रदेश मंत्री का ‘कड़ा प्रहार’
बीजेपी के प्रदेश मंत्री अभिजात मिश्रा ने इस मामले को लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को एक बेहद ‘कड़े शब्दों’ में पत्र लिखा है। पत्र के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
- इस कृत्य को करोड़ों लोगों की भावनाओं को आहत करने वाला बताया गया है।
- परीक्षा पत्र सेट करने वाले अधिकारियों और पैनल के खिलाफ कठोर दंडात्मक कार्यवाही की मांग की गई है।
- इसे एक सोची-समझी साजिश करार दिया गया है ताकि ब्राह्मण समाज की छवि को धूमिल किया जा सके।
क्या हाशिए पर है यूपी का ब्राह्मण?
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि यूपी में ब्राह्मणों की स्थिति ‘पैसेंजर ट्रेनों के प्लेटफार्म’ जैसी हो गई है—जहां भीड़ तो है, पर सम्मान और गति का अभाव है। हालिया घटनाओं ने इस असंतोष को और हवा दी है:
बटुक ब्राह्मणों के साथ हिंसा: हाल के दिनों में बटुक ब्राह्मणों के साथ हुई हिंसा और दोषियों को कथित तौर पर मिलने वाला ‘अभयदान’ समाज में असुरक्षा की भावना पैदा कर रहा है।
शंकराचार्य का अपमान: धार्मिक आयोजनों के दौरान शंकराचार्य को कथित तौर पर स्नान से रोकने और उन्हें ‘इरादतन’ अपमानित करने के आरोपों ने साधु-संतों में भी रोष पैदा किया है।
विधायकों पर अनुशासन की गाज: जब ब्राह्मण विधायकों ने अपनी बात रखने के लिए मीटिंग की, तो उन्हें ‘अनुशासनहीनता’ के नोटिस थमा दिए गए, जिसे शक्ति के दमन के तौर पर देखा गया।
व्यवस्था की जड़ें और ‘शीर्ष’ का हस्तक्षेप
आमतौर पर माना जाता है कि किसी भी विचार का विस्तार नीचे (जमीन) से ऊपर की ओर होता है। लेकिन इस मामले में ब्राह्मण समाज के बुद्धिजीवियों का मानना है कि ‘ब्राह्मण विरोध का यह पेड़’ उल्टा है—इसकी जड़ें ‘शीर्ष’ (सत्ता के केंद्र) से शुरू होकर नीचे व्यवस्था के जंगल (प्रशासनिक अधिकारियों) तक फैल रही हैं।
> “जब सरकारी परीक्षा के प्रश्न पत्र में इस तरह की शब्दावली का उपयोग होता है, तो यह स्पष्ट है कि यह केवल एक क्लर्क की गलती नहीं, बल्कि एक गहरी मानसिक सोच का परिणाम है।”>




