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लम्भुआ तहसील में ‘तमाशा’ बना समाधान दिवस: अधिकारियों ने फेरा जनता से मुँह, खाली कुर्सियां बनीं प्रशासन का चेहरा

लम्भुआ (सुल्तानपुर): क्या लम्भुआ तहसील में लोकतंत्र दम तोड़ रहा है? शनिवार को तहसील समाधान दिवस के नाम पर जो ‘प्रशासनिक सर्कस’ देखने को मिला, उसने योगी सरकार के सुशासन के दावों की कलई खोलकर रख दी है। जहाँ जनता की समस्याओं का अंबार लगा है, वहीं अधिकारियों की फौज नदारद रही। खाली पड़ी कुर्सियों ने साफ़ कर दिया है कि यहाँ की व्यवस्था अब ‘भगवान भरोसे’ है।

कुर्सी-कुर्सी का खेल: गायब रहे जिम्मेदार

तहसील परिसर में शिकायतों के निस्तारण के लिए बड़ी-बड़ी उम्मीदें और कुर्सियां तो सजाई गई थीं, लेकिन उन पर बैठने वाले अधिकारी ‘गूलर का फूल’ हो गए। एसडीएम और तहसीलदार की मौजूदगी के बावजूद ब्लॉक स्तर के अधिकारियों की सामूहिक अनुपस्थिति यह बताती है कि इन्हें न तो शासन का डर है और न ही जनता की पीड़ा से कोई सरोकार।

निस्तारण के नाम पर ‘कागजी बाजीगरी’

आरोप है कि तहसील में शिकायतों का समाधान नहीं, बल्कि उनका ‘गला घोंटा’ जा रहा है। फरियादी पिछले कई महीनों से एक ही समस्या को लेकर चक्कर काट रहे हैं, लेकिन हर बार उन्हें कोरा आश्वासन देकर चलता कर दिया जाता है। तस्वीरों में दिख रही खाली कुर्सियां इस बात का प्रमाण हैं कि अब जनता ने भी मान लिया है कि यहाँ आने से सिर्फ समय और पैसे की बर्बादी होती है।

व्यवस्था या मजाक?

*दहशत में फरियादी: न्याय की उम्मीद में आए बुजुर्गों को अधिकारियों की बेरुखी झेलनी पड़ रही है।

* निरंकुश अफसरशाही: क्या अनुपस्थित अधिकारियों पर कोई गाज गिरेगी या मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा?

* जनता का आक्रोश: ग्रामीणों का कहना है कि यह ‘समाधान दिवस’ नहीं, बल्कि अधिकारियों का ‘विश्राम दिवस’ बन चुका है।

बड़ा सवाल: जिम्मेदार कौन?

जब नीचे से लेकर ऊपर तक का हॉल खाली पड़ा हो, तो क्या इसे प्रशासनिक विफलता नहीं माना जाना चाहिए? आखिर क्यों लम्भुआ तहसील में फरियादियों की तुलना में कुर्सियां अधिक थीं? यह सन्नाटा चीख-चीख कर कह रहा है कि यहाँ का तंत्र पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है।

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