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फुटपाथ पर धर्मगुरु और फाइलों में उलझा प्रशासन: तीखे सवालों ने उखाड़े अफसरों के पैर, फिर शुरू हुआ रटा-रटाया स्पष्टीकरण का खेल।

प्रयागराज के माघ मेले में मौनी अमावस्या के अवसर पर शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और प्रशासन के बीच जो गतिरोध पैदा हुआ, उसने अब एक बड़े विवाद का रूप ले लिया है।

प्रयागराज: अफसरों की ‘AI’ चुप्पी और पत्रकारों के ‘ब्रह्मास्त्र’, शंकराचार्य के धरने पर गरमाई सियासत

प्रयागराज। धर्म, परंपरा और प्रशासन के टकराव के बीच प्रयागराज का माघ मेला क्षेत्र आज एक अभूतपूर्व प्रेस कॉन्फ्रेंस का गवाह बना। मामला ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के धरने और पुलिस द्वारा कथित बदसलूकी से जुड़ा था। लेकिन इस प्रेस वार्ता का दृश्य किसी फिल्मी ड्रामे से कम नहीं रहा, जहां ‘माहिर’ अफसरों के रटे-रटाए जवाबों के आगे पत्रकारों के तीखे सवालों ने उन्हें वापस लौटने पर मजबूर कर दिया।

दृश्य 1: अफसरों की बेरुखी और ‘वॉकआउट’

प्रेस कॉन्फ्रेंस की शुरुआत में प्रशासन के आला अधिकारियों ने घटना को नया मोड़ देने की कोशिश की। अफसरों ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि सुरक्षा कारणों और भीड़ के दबाव के चलते ‘पालकी’ को रोका गया था। जब अपनी बात पूरी कर अधिकारी उठे, तो पत्रकारों ने सवालों की बौछार कर दी।

हैरानी की बात यह रही कि अधिकारियों ने पत्रकारों के इन सवालों को ‘AI जनरेटेड’ (यानी बनावटी या महत्वहीन) समझकर अनदेखा कर दिया। वे जवाब देने के बजाय अपनी कुर्सियों से उठे और बाहर की ओर चल दिए। ऐसा लगा मानो प्रशासन इस संवेदनशील धार्मिक मुद्दे को केवल एक ‘कानून व्यवस्था’ की फाइल मानकर बंद करना चाहता है।

दृश्य 2: पत्रकारों के ‘ब्रह्मास्त्र’ और अधिकारियों की घरवापसी

अफसरों को जाते देख पत्रकारों ने सवालों के ऐसे ‘तीर’ छोड़े जो सीधे ब्रह्मास्त्र बनकर उनके सामने खड़े हो गए। सवाल तीखे थे:

* “क्या मां गंगा से मिलने के लिए भी अब परमिशन लेनी होगी?”

* “क्या परंपराएं सिर्फ कागजों पर लिखी सुरक्षा नियमावली से छोटी हैं?”

* “शंकराचार्य के साथ हुई धक्का-मुक्की और टूटे हुए छत्र का जिम्मेदार कौन?”

सवालों की तपिश इतनी ज्यादा थी कि बाहर निकल रहे अधिकारियों को अपने कदम पीछे खींचने पड़े। वे वापस लौटे, लेकिन इस बार उनके पास तर्कों की कमी थी। उन्होंने फिर से वही ‘रट्टा मार’ जवाब दोहराने शुरू कर दिए कि “प्रोटोकॉल का पालन जरूरी है” और “भीड़ को नियंत्रित करना प्राथमिकता थी।”

शंकराचार्य का अडिग संकल्प: “फुटपाथ पर रहूंगा, पर झुकूंगा नहीं”

उधर, शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पिछले 24 घंटों से अधिक समय से अन्न-जल त्याग कर धरने पर बैठे हैं। उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि:

* जब तक प्रशासन माफी नहीं मांगता, वे अपने शिविर में प्रवेश नहीं करेंगे।

* वे माघ मेले के हर पर्व पर आएंगे, लेकिन शिविर के बजाय फुटपाथ पर रहेंगे।

* परंपरा के अनुसार पालकी में ही स्नान करेंगे, चाहे कितनी भी बाधाएं आएं।

निष्कर्ष: धर्म की सीढ़ी और सत्ता का संतुलन

मामला सीधे तौर पर धर्म से जुड़ा है और वर्तमान सरकार ‘धर्म की सीढ़ी’ पर ही अपनी राजनीतिक और सांस्कृतिक आधारशिला रखती है। ऐसे में एक सर्वोच्च धर्मगुरु का अपमान प्रशासन के लिए गले की फांस बन गया है। अधिकारियों की ‘कोशिश’ सच को दबाने की थी, लेकिन पत्रकारों के सवालों और शंकराचार्य की जिद ने यह साबित कर दिया कि “कोशिश करने वालों की हार नहीं होती”—खासकर तब जब लड़ाई आस्था और सम्मान की हो।

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