बेअसर होती दवाएं: दिल्ली के अस्पतालों में एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस का खौफ, विशेषज्ञों ने दी चेतावनी।

यह एक अत्यंत गंभीर और समसामयिक विषय है। एंटीबायोटिक दवाओं का दुरुपयोग न केवल दिल्ली, बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक ‘साइलेंट पेंडेमिक’ (शांत महामारी) बनता जा रहा है।
दिल्ली में एंटीबायोटिक का अंधाधुंध इस्तेमाल: सुपरबग की आहट से सहमी राजधानी
नई दिल्ली: देश की राजधानी दिल्ली इस वक्त एक ऐसे स्वास्थ्य संकट की ओर बढ़ रही है जो कोरोना से भी अधिक घातक साबित हो सकता है। दिल्ली के सरकारी और निजी अस्पतालों में एंटीबायोटिक दवाओं का अंधाधुंध इस्तेमाल (Irrational Use) चरम पर है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसके लिए डॉक्टर और मेडिकल स्टोर संचालक दोनों ही समान रूप से जिम्मेदार हैं।
मामूली सर्दी-जुकाम में भी ‘हाई-डोज’ का सहारा
आमतौर पर वायरल इंफेक्शन, जो 3 से 5 दिनों में अपने आप ठीक हो जाते हैं, उनके लिए भी डॉक्टर धड़ल्ले से Azithromycin और Amoxicillin जैसी दवाएं लिख रहे हैं। दिल्ली के प्रमुख अस्पतालों की ओपीडी में देखा गया है कि बुखार के पहले ही दिन मरीज को एंटीबायोटिक दे दी जाती है, जबकि इसकी कोई चिकित्सकीय आवश्यकता नहीं होती।
मेडिकल स्टोर्स की मनमानी: बिना पर्चे के बिक्री
नियमों के अनुसार, ‘शेड्यूल H’ और ‘H1’ श्रेणी की दवाएं बिना डॉक्टर के पर्चे के नहीं बेची जा सकतीं। लेकिन दिल्ली के मोहल्लों में स्थित मेडिकल स्टोर्स पर स्थिति इसके उलट है:
ओवर-द-काउंटर बिक्री: सिरदर्द या हल्के बदन दर्द की शिकायत करने पर भी केमिस्ट अपनी मर्जी से एंटीबायोटिक दे देते हैं।
अधूरा कोर्स: दुकानदार अक्सर मरीजों को दवा के 1 या 2 पत्ते ही देते हैं, जिससे मरीज कोर्स पूरा नहीं करता।
मुनाफे का खेल: कई स्टोर्स पर अधिक कमीशन वाली महंगी एंटीबायोटिक्स को प्राथमिकता दी जाती है।
क्यों खतरनाक है यह स्थिति?
जब हम बिना जरूरत एंटीबायोटिक लेते हैं, तो हमारे शरीर के बैक्टीरिया उनके प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेते हैं। इसे एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) कहते हैं।
| खतरा | परिणाम |
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| सुपरबग का जन्म | ऐसी बीमारियाँ जिन पर कोई दवा काम नहीं करेगी। |
| इलाज का खर्च | साधारण संक्रमण के लिए भी महंगी और ‘लास्ट रिसॉर्ट’ दवाओं का उपयोग। |
| अंगों पर प्रभाव | लिवर और किडनी को गंभीर नुकसान की संभावना। |
| मृत्यु दर में वृद्धि | भविष्य में छोटी सी सर्जरी या घाव भी जानलेवा हो सकता है। |
विशेषज्ञों की राय
सफदरजंग अस्पताल के एक वरिष्ठ चिकित्सक के अनुसार, “दिल्ली में दवाओं के प्रति रेजिस्टेंस इतनी बढ़ गई है कि अब सामान्य एंटीबायोटिक्स ने काम करना बंद कर दिया है। यदि यही हाल रहा, तो अगले 10 वर्षों में हम एंटीबायोटिक-पूर्व युग (Pre-Antibiotic Era) में पहुँच जाएंगे, जहाँ मामूली संक्रमण भी जानलेवा होगा।”
क्या है समाधान?
सख्त निगरानी: ड्रग कंट्रोल विभाग को मेडिकल स्टोर्स पर औचक छापेमारी करनी चाहिए।
डॉक्टरों के लिए गाइडलाइंस: केवल जरूरी होने पर ही एंटीबायोटिक लिखने के कड़े नियम हों।
जन जागरूकता: आम जनता को यह समझना होगा कि हर बुखार में एंटीबायोटिक ‘संजीवनी’ नहीं, बल्कि ‘जहर’ भी हो सकती है।
सावधान रहें: बिना डॉक्टर की सलाह के कोई भी दवा न लें और यदि एंटीबायोटिक शुरू की है, तो उसका कोर्स कभी बीच में न छोड़ें।



