दिल्ली एनसीआरदुनियादेशमुख्य समाचारयू पीलोकल न्यूज़

सुप्रीम कोर्ट की चुनाव आयोग को दो टूक- “अपनी शक्तियों को कानून के दायरे में रखें, कोई भी अथॉरिटी असीमित नहीं।”

सुप्रीम कोर्ट ने मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (Special Intensive Revision – SIR) की प्रक्रिया को लेकर चुनाव आयोग (ECI) को कड़ी चेतावनी दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग की शक्तियां “असीमित” नहीं हैं और इस प्रक्रिया से आम जनता को अनावश्यक परेशानी नहीं होनी चाहिए।

 

सुप्रीम कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां

 

सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट की प्रमुख बातें निम्नलिखित हैं:

शक्तियां अनियंत्रित नहीं: कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग के पास मतदाता सूची को संशोधित करने की “अद्वितीय” शक्ति है, लेकिन यह “असीमित” (Unlimited) नहीं हो सकती। जस्टिस बागची ने कहा, “कोई भी शक्ति बेलगाम (Untrammelled) नहीं हो सकती, चाहे वह कितनी भी बड़ी क्यों न हो।”

 

अंकुश लगाना जरूरी: सीजेआई सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि शक्ति को “आवारा घोड़े” (Unruly horse) की तरह नहीं छोड़ा जा सकता। इसे कानून और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के दायरे में विनियमित (Regulate) होना चाहिए।

 

नागरिकों पर बोझ: कोर्ट ने चिंता जताई कि SIR के नाम पर मौजूदा मतदाताओं से बार-बार दस्तावेज़ मांगना उन्हें “तनाव और दबाव” में डाल रहा है।

 

दस्तावेजों का विवाद: 7 बनाम 11
अदालत में सबसे बड़ा सवाल दस्तावेजों की संख्या को लेकर उठा। याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि जब नियम स्पष्ट हैं, तो चुनाव आयोग अतिरिक्त शर्तें क्यों थोप रहा है?

| विवरण | स्थिति |
|—|—|
| नियमों के तहत (Form 6) | नए वोटर या शिफ्टिंग के लिए केवल 7 दस्तावेजों का उल्लेख है। |
| चुनाव आयोग की SIR प्रक्रिया | आयोग सत्यापन के लिए 11 दस्तावेजों की मांग कर रहा है। |
| कोर्ट का सवाल | जब नियम 7 दस्तावेजों की बात करते हैं, तो SIR के तहत 11 क्यों मांगे जा रहे हैं? |
कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि यदि कोई व्यक्ति पहले से ही पंजीकृत वोटर है और कई बार मतदान कर चुका है, तो उसे अपनी नागरिकता या पात्रता साबित करने के लिए नए सिरे से कठिन प्रक्रियाओं से नहीं गुजरना चाहिए।

 

गंभीर परिणाम की चेतावनी

 

सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को चेतावनी दी है कि यदि SIR की प्रक्रिया में कोई गड़बड़ी या अवैधता पाई गई, तो कोर्ट पूरी संशोधन प्रक्रिया को रद्द कर सकता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मतदाता सूची को “साफ-सुथरा” (Purify) करने के नाम पर किसी भी वैध भारतीय नागरिक को वोट देने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।

 

प्रमुख मुद्दे जो कोर्ट में उठे

 

प्राकृतिक न्याय: क्या मतदाताओं को उनके नाम हटाए जाने से पहले पर्याप्त सुनवाई का मौका दिया जा रहा है?

दस्तावेजों की स्वीकार्यता: क्या आधार कार्ड और मैट्रिक सर्टिफिकेट जैसे दस्तावेजों को स्वीकार करने में स्थानीय अधिकारी आनाकानी कर रहे हैं?

पारदर्शिता: क्या पूरी प्रक्रिया पारदर्शी है या यह किसी विशेष वर्ग को लक्षित कर रही है?

अगला कदम: कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि वह अपनी वेबसाइट पर स्पष्ट निर्देश जारी करे ताकि मतदाताओं और फील्ड अधिकारियों (BLOs) के बीच दस्तावेजों को लेकर कोई भ्रम न रहे।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!