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सुलतानपुर विशेष रिपोर्ट: अपराध के साये में जिला; सोशल मीडिया की ‘सिंघम’ छवि बनाम खूनी हकीकत।

सर्वेश श्रीवास्तव की विशेष रिपोर्ट
सुलतानपुर । जिले में पिछले तीन महीनों का घटनाक्रम कानून-व्यवस्था के दावों पर सवालिया निशान लगा रहा है। एक तरफ जहां 6 फरवरी को जिले की कमान संभालने वाली पुलिस अधीक्षक (SP) चारू निगम को सोशल मीडिया पर “लेडी सिंघम” और “आला हाकिम” बताकर वाहवाही बटोरी जा रही है, वहीं दूसरी ओर जमीनी हकीकत हत्याओं और संदिग्ध मौतों के लहू से लाल है।

​तीन माह: हत्याओं का खौफनाक कैलेंडर
​फरवरी से मई तक के आंकड़े बताते हैं कि अपराधियों में कानून का खौफ कम और दुस्साहस ज्यादा है।

पेश है प्रमुख घटनाओं का ब्यौरा:

​फरवरी: मासूम से लेकर बुजुर्ग तक निशाने पर

​7 फरवरी: धम्मौर के रामपुर में 11 वर्षीय विवेक चौहान की गला दबाकर हत्या। शव छप्पर में लटका मिला।
​11-16 फरवरी: गोसाईगंज और कुड़वार में पारिवारिक कलह और प्रेम संबंधों के चलते हत्याएं। लंभुआ में पत्नी के प्रेमी ने पति को मौत के घाट उतारा।
​14 फरवरी: कुड़वार के मीरापुर में 65 वर्षीय रामतेज की हत्या।

​मार्च: जमीनी रंजिश और सरेआम कत्ल

1 मार्च: बंधुआकला के मनियारी में मामूली विवाद (बकरी चराने) पर शाहिद हुसैन की गोली मारकर हत्या।
5 मार्च: कोतवाली देहात में होमगार्ड के बेटे मोहित सोनकर की हत्या। इस संघर्ष में दूसरे पक्ष के एक व्यक्ति की भी मौत हुई।
​25 मार्च: कुड़वार कस्बे में दिनदहाड़े प्रॉपर्टी डीलर माता प्रसाद पांडेय की गोली मारकर हत्या, जिससे इलाके में दहशत फैल गई।

​अप्रैल: रिश्तों का कत्ल और अनसुलझी गुत्थियां

​3 अप्रैल: मड़हा गांव में एक पिता (शंभूदयाल) ने अपने ही 9 माह के मासूम को कुल्हाड़ी से काट डाला।
​12 अप्रैल: जयसिंहपुर में दरोगा के पिता विजय प्रताप सिंह की गोली मारकर हत्या।
​15 अप्रैल: बरही गांव में युवती के साथ दुष्कर्म के बाद हत्या की पुष्टि ने सनसनी मचा दी।
​22 अप्रैल: पंचायत सहायिका रीता देवी का शव पंचायत भवन में मिला, जिसका रहस्य अब तक पुलिस नहीं सुलझा सकी है।

​मई: जारी है मौत का सिलसिला

​3-4 मई: लंभुआ में 14 वर्षीय बालक का शव तालाब में मिला। वहीं चांदा और शिवगढ़ में नदी व नहर से अज्ञात शव बरामद हुए।
​9 मई: बंधुआकला के लंगड़ी गांव में 65 वर्षीय विमलेश सिंह की गला रेतकर निर्मम हत्या।

​सोशल मीडिया बनाम ग्राउंड रिपोर्ट

​जिले की कानून व्यवस्था को लेकर अब आम जनता के बीच तीखी बहस छिड़ गई है। सवाल यह है कि यदि पुलिस प्रशासन का इकबाल बुलंद है और ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति प्रभावी है, तो हर दूसरे दिन एक नई लाश क्यों मिल रही है?

​मुख्य चिंताएं:

​प्रचार की राजनीति: क्या पुलिस का ध्यान वास्तविक गश्त और इंटेलिजेंस से हटकर सोशल मीडिया पर छवि चमकाने में लगा है?
​अनसुलझे मामले: ट्रक चालक प्रदीप यादव की हत्या और पंचायत सहायिका रीता देवी की संदिग्ध मौत जैसे मामलों में पुलिस के हाथ अब तक खाली क्यों हैं?
​बढ़ता दुस्साहस: जमीनी विवाद और छोटी-छोटी बातों पर कुल्हाड़ी और गोलियों का चलना पुलिस के सूचना तंत्र (L.I.U.) की विफलता को दर्शाता है।


​सुलतानपुर में पिछले 90 दिनों में जिस तरह से हत्याओं का ग्राफ बढ़ा है, उसने “सुरक्षित जनपद” के दावों को बेदम कर दिया है। हालांकि कई मामलों में पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए गिरफ्तारियां की हैं, लेकिन अपराध को होने से पहले रोकने में विफल रहना प्रशासन की सबसे बड़ी कमजोरी बनकर उभरा है।
​बड़ा सवाल: क्या केवल ‘सिंघम’ की टैगलाइन से जनता सुरक्षित महसूस करेगी, या फिर पुलिस को अपराधियों के भीतर कानून का वास्तविक डर पैदा करने के लिए ठोस जमीनी कार्रवाई करनी होगी?

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