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हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: उत्तर प्रदेश में ग्राम प्रधान अब नहीं रह पाएंगे प्रशासक, चुनावों को लेकर सरकार का आदेश ‘शून्य’ घोषित

इलाहाबाद : इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश के पंचायत राज इतिहास और आगामी त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और कड़ा फैसला सुनाया है। माननीय न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की एकल पीठ ने स्पष्ट कर दिया है कि राज्य के ग्राम प्रधानों को अब प्रशासक के रूप में कार्य जारी रखने की अनुमति नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने चुनाव टालने की मंशा से जारी किए गए सरकार के पिछले आदेशों को पूरी तरह से अवैध और कानूनन शून्य (Non-est) करार दिया है।

​मुख्य सुर्खियां और बड़ी बातें:

  • प्रशासक के रूप में पूर्व प्रधानों की पारी समाप्त: कोर्ट ने अरविंद राठौर बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले की सुनवाई करते हुए साफ कहा कि चूंकि सरकार द्वारा जारी किए गए आदेश ही गैर-कानूनी हैं, इसलिए पूर्व ग्राम प्रधानों को प्रशासक (Administrator) बनाकर रखने का कोई औचित्य नहीं रह जाता.

  • पुरानी रद्द धारा का इस्तेमाल करने पर भड़का कोर्ट: राज्य सरकार ने 25 और 26 मई 2026 को उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम की धारा 12(3-A) का हवाला देकर आदेश जारी किए थे। कोर्ट ने सरकार को फटकार लगाते हुए याद दिलाया कि इस धारा को हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच साल 2000 में ही (प्रेम लाल पटेल बनाम यू.पी. राज्य) असंवैधानिक और रद्द घोषित कर चुकी है।

  • शीर्ष अधिकारी पर अवमानना की तलवार: कोर्ट ने प्रमुख सचिव/जिम्मेदार अधिकारी (प्रतिवादी संख्या 2) को चेतावनी दी है कि वे अपने व्यक्तिगत हलफनामे में स्पष्ट करें कि एक मृत और असंवैधानिक कानून के तहत उन्होंने आदेश कैसे जारी किए, अन्यथा उनके खिलाफ सीधे कोर्ट की अवमानना (Contempt of Court) का मुकदमा चलाया जाएगा।

​”निर्वाचन आयोग तैयार, तो सरकार क्यों पीछे?”

​सुनवाई के दौरान राज्य निर्वाचन आयोग ने कोर्ट के सामने बेहद चौंकाने वाला खुलासा किया। आयोग के वकील ने बताया कि:

​”हमने 10 जून 2026 को ही पूरे प्रदेश की मतदाता सूची (Electoral Roll) का अंतिम प्रकाशन कर दिया है। हम चुनाव कराने के लिए पूरी तरह मुस्तैद हैं, लेकिन राज्य सरकार चुनाव के लिए जरूरी रसद, संसाधन और लॉजिस्टिक्स (Logistics) उपलब्ध नहीं करा रही है, जिसके कारण यह रुकावट आ रही है।”

 

​याचिकाकर्ता के वकील ने भी दलील दी कि संविधान के अनुच्छेद 243E और 243K के तहत किसी भी पंचायत का कार्यकाल 5 वर्ष से एक भी दिन ज्यादा नहीं बढ़ाया जा सकता और चुनाव समय पर कराना सरकार की संवैधानिक मजबूरी है।

​OBC आरक्षण की रिपोर्ट और सरकार को ‘अंतिम मौका’

​सरकार की तरफ से दलील दी गई कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर गठित पिछड़ा वर्ग (OBC) आयोग की आरक्षण रिपोर्ट आने तक चुनाव कराना संभव नहीं है। इस पर नाराजगी जताते हुए कोर्ट ने कहा कि आयोग का गठन हुए लंबा समय बीत गया, लेकिन रिपोर्ट अब तक क्यों नहीं आई?

​अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार को “अंतिम अवसर” देते हुए एक विस्तृत हलफनामा पेश करने को कहा है, जिसमें OBC आयोग की रिपोर्ट की स्थिति और चुनाव कराने का निश्चित टाइम-फ्रेम (समय-सीमा) स्पष्ट रूप से दर्ज हो। यदि सरकार ऐसा नहीं करती है, तो जिम्मेदार अधिकारी को निजी रूप से कोर्ट में हाजिर होना पड़ेगा।

​अगली सुनवाई:

  • ​हाई कोर्ट अब इस बेहद संवेदनशील और बड़े मामले पर अगली सुनवाई 13 जुलाई, 2026 को दोपहर 02:00 बजे करेगा।

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