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चुनाव से पहले बदलते राजनीतिक समीकरण — नैतिकता का तकाजा या सिर्फ सत्ता की बिसात?

​लखनऊ / विशेष रिपोर्ट:

जैसे-जैसे उत्तर प्रदेश में चुनावी सरगर्मियां तेज हो रही हैं, वैसे-वैसे राज्य के सियासी गलियारों में नए समीकरणों का बनना और पुराने रिश्तों का बिगड़ना शुरू हो चुका है। गठबंधन, दलबदल और जातीय गठजोड़ की इस राजनीति ने एक बार फिर से यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या समकालीन चुनाव में ‘नैतिकता’ नाम की कोई चीज़ बची है, या सब कुछ सिर्फ ‘सत्ता की चाबी’ हथियाने का खेल बनकर रह गया है?

​1. सिद्धांतों पर भारी पड़ता ‘विनेबिलिटी’ का फॉर्मूला

​राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि अब किसी भी दल के लिए विचारधारा या नीतियां प्राथमिकता में नहीं रहीं। चुनाव जीतने के लिए समीकरण ऐसे बैठाए जा रहे हैं कि कल तक एक-दूसरे के कट्टर विरोधी रहे नेता और पार्टियां आज एक ही मंच पर गलबहियां डालते नज़र आ रहे हैं। दलबदल का आलम यह है कि टिकट कटने या मिलने के भरोसे पर रातों-रात नेताओं के झंडे और वफादारियां बदल जाती हैं।

​2. जातीय और क्षेत्रीय गठजोड़ की बिसात

​उत्तर प्रदेश की राजनीति हमेशा से सामाजिक समीकरणों पर टिकी रही है।

  • ​सत्तारूढ़ खेमा (BJP): छोटे-छोटे क्षेत्रीय व जातीय दलों को साथ लेकर गैर-यादव पिछड़ों, दलितों और अपने पारंपरिक कोर वोटबैंक को साधने में जुटा है।
  • ​विपक्ष (SP व सहयोगी): पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) और सामाजिक न्याय का कार्ड खेलकर जातीय लामबंदी को नए सिरे से गढ़ने की कोशिश कर रहा है।

​दोनों ही खेमों की नजर केवल इस बात पर है कि किस तरह वोटबैंक की गणित में 1-1 प्रतिशत का इजाफा किया जाए, भले ही इसके लिए किसी भी विरोधी को गले लगाना पड़े।

​3. जनता के असल मुद्दे बनाम सियासी पैंतरेबाज़ी

​चुनाव की घोषणा से ठीक पहले वादों, लोकलुभावन घोषणाओं और आरोप-प्रत्यारोप का दौर अपनी चरम सीमा पर है। बेरोजगारी, महंगाई, विकास, स्थानीय मुद्दे और कानून-व्यवस्था जैसे जनता से जुड़े बुनियादी सवाल अक्सर इन सियासी समीकरणों के शोर में दब जाते हैं। चुनावी मंचों से जनता के हित की बातें तो होती हैं, लेकिन पर्दे के पीछे सारी जोड़-तोड़ केवल सीट और जीत के अंतर पर जाकर टिक जाती है।

​निष्कर्ष:

लोकतंत्र में जनता ही जनार्दन है। चुनाव से पहले बदले जाने वाले ये राजनीतिक समीकरण नेताओं की सत्ता पाने की बेचैनी को तो साफ दर्शाते हैं, लेकिन क्या यह मतदाता की आकांक्षाओं पर खरे उतर पाएंगे? यह तो आने वाले चुनाव के नतीजे ही तय करेंगे। फिलहाल, राजनीति के इस ‘शतरंज’ में नैतिकता हाशिये पर है और सत्ता की बिसात पर मोहरे तेजी से बदले जा रहे हैं।

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