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इलाहाबाद हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: निर्दोष को जेल भेजने वाले ACP की सैलरी से कटेगा ₹2 लाख जुर्माना

'शांति भंग' की धाराओं के दुरुपयोग पर हाईकोर्ट सख्त; अवैध हिरासत पर ₹25,000 प्रतिदिन मुआवजे का आदेश

प्रयागराज।

उत्तर प्रदेश में पुलिस कमिश्नरेट प्रणाली के तहत “शांति भंग” की धाराओं के दुरुपयोग पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बेहद सख्त और ऐतिहासिक रुख अपनाया है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि देश में नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता सर्वोपरि है और किसी भी व्यक्ति को बिना उचित वैधानिक प्रक्रिया का पालन किए जेल की सलाखों के पीछे नहीं धकेला जा सकता।

​न्यायमूर्ति सिद्धार्थ एवं न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने हेबियस कॉर्पस (बंदी प्रत्यक्षीकरण) रिट याचिका संख्या 317/2026 (मंसूर अहमद उर्फ लल्लू बनाम उत्तर प्रदेश राज्य) पर सुनवाई करते हुए यह अभूतपूर्व फैसला सुनाया है।

​क्या है पूरा मामला?

​याचिकाकर्ता मंसूर अहमद उर्फ लल्लू को पुलिस ने शांति भंग की आशंका के तहत हिरासत में लिया था। इसके बाद, बिना उचित कानूनी प्रक्रिया और नियमों का पालन किए उन्हें 8 दिनों तक अवैध हिरासत (जेल) में रखा गया। हाईकोर्ट ने इस पर कड़ा ऐतराज जताते हुए इसे नागरिक अधिकारों का खुला उल्लंघन माना।

​कोर्ट के फैसले की मुख्य बातें:

  • ₹2 लाख का मुआवजा: अदालत ने पीड़ित मंसूर अहमद को 8 दिन की अवैध हिरासत के बदले ₹2 लाख का मुआवजा देने का आदेश दिया है।
  • दोषी अफसर की सैलरी से वसूली: कोर्ट ने साफ किया कि मुआवजे का यह बोझ सरकारी खजाने (जनता के टैक्स के पैसे) पर नहीं डाला जाएगा। यह राशि सीधे तौर पर जिम्मेदार दोषी अधिकारी, तत्कालीन सहायक पुलिस आयुक्त (ACP) के वेतन से वसूल की जाएगी।
  • ₹25,000 प्रतिदिन का पैमाना: अदालत के इस फैसले से साफ हो गया है कि बिना वैधानिक प्रक्रिया के किसी को बंद करने पर ₹25,000 प्रतिदिन के हिसाब से मुआवजे का रास्ता साफ हो गया है।

​”व्यक्तिगत स्वतंत्रता से खिलवाड़ मंजूर नहीं”

​हाईकोर्ट ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि कमिश्नरेट प्रणाली या शांति भंग की धाराओं का मतलब यह कतई नहीं है कि कानून का पालन कराने वाले ही कानून को ताक पर रख दें।

​”किसी भी नागरिक की स्वतंत्रता को प्रशासनिक सनक के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। यदि कोई अधिकारी अपनी शक्तियों का दुरुपयोग कर किसी निर्दोष को जेल भेजता है, तो उसकी जवाबदेही तय होना अनिवार्य है।”

इलाहाबाद हाईकोर्ट

 

​फैसले का दूरगामी असर

​कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक, 8 जून 2026 को आया यह फैसला उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यशैली में बड़े सुधार का सबब बनेगा। अक्सर देखने में आता है कि धारा 151/107/116 जैसी शांति भंग की धाराओं के तहत पुलिस मनमाने तरीके से चालान कर देती है। हाईकोर्ट के इस सख्त रुख के बाद अब अधिकारियों को किसी को भी जेल भेजने से पहले दस बार सोचना होगा, क्योंकि अब लापरवाही की कीमत उन्हें अपनी जेब से चुकानी पड़ेगी।

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